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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा |  ४२   क
भार्या च पतिशुश्रूषां न करिष्यति काचन ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति