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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
एकाहार्यं जगत्सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम् |  ४०   क
अधर्मो वर्धति महान्न च धर्मः प्रवर्तते ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति