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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छभूतं जगत्सर्वं निश्क्रिय़ं यज्ञवर्जितम् |  २९   क
भविष्यति निरानन्दमनुत्सवमथो तथा ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति