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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति |  ३   क
फललाभश्च सद्यः स्यात्सर्वभूतहितं च तत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति