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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
तपसा चिन्तय़ंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षय़े |  ८५   क
भूतं भव्यं भविष्यच्च जानन्नपि नराधिप ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति