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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
शाखाय़ां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णाय़ां नराधिप |  ८२   क
पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति