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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मिष्ठाः परिहीय़न्ते पापीय़ान्वर्धते जनः |  ४७   क
धर्मस्य वलहानिः स्यादधर्मश्च वली तथा ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति