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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽहं सहसा राजन्वाय़ुवेगेन निःसृतः |  ११३   क
महात्मनो मुखात्तस्य विवृतात्पुरुषोत्तम ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति