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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
य इदं शृणुय़ान्नित्यं मनोश्चरितमादितः |  ५४   क
स सुखी सर्वसिद्धार्थः स्वर्गलोकमिय़ान्नरः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति