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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथाव्रवीदनिमिषस्तानृषीन्सहितांस्तदा |  ४८   क
अहं प्रजापतिर्व्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते |  ४८   ख
मत्स्यरूपेण यूय़ं च मय़ास्मान्मोक्षिता भय़ात् ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति