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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तच्च नौवन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् |  ४७   क
ख्यातमद्यापि कौन्तेय़ तद्विद्धि भरतर्षभ ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति