वन पर्व  अध्याय १८५

मार्कण्डेय़ उवाच

अचिराद्भगवन्भौममिदं स्थावरजङ्गमम् |  २६   क
सर्वमेव महाभाग प्रलय़ं वै गमिष्यति ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति