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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत |  १८   क
नय़ मां भगवन्साधो समुद्रमहिषीं प्रभो |  १८   ख
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति