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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
ये गुरूनुपसेवन्ते निय़ता व्रह्मचारिणः |  २४   क
पन्थानं सर्वलोकानां ते जानन्ति मनीषिणः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति