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आदि पर्व
अध्याय १८४
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वैशम्पाय़न उवाच
साय़ेऽथ भीमस्तु रिपुप्रमाथी; जिष्णुर्यमौ चापि महानुभावौ |  ३   क
भैक्षं चरित्वा तु युधिष्ठिराय़; निवेदय़ां चक्रुरदीनसत्त्वाः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति