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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
मोघेष्टा मोघसङ्कल्पा मोघज्ञाना विचेतसः |  १९   क
सर्वातिशङ्किनश्चैव संवृत्ताः क्लेशभागिनः |  १९   ख
अशुभैः कर्मभिश्चापि प्राय़शः परिचिह्निताः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति