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शान्ति पर्व
अध्याय १८१
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भृगुरु उवाच
पिशाचा राक्षसाः प्रेता वहुधा म्लेच्छजातय़ः |  १८   क
प्रनष्टज्ञानविज्ञानाः स्वच्छन्दाचारचेष्टिताः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति