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शान्ति पर्व
अध्याय १८१
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भृगुरु उवाच
व्रह्म चैतत्पुरा सृष्टं ये न जानन्त्यतद्विदः |  १७   क
तेषां वहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र हि जातय़ः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति