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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
य एष वृक्षं तरसावरुज्य; राज्ञां विकारे सहसा निवृत्तः |  १९   क
वृकोदरो नान्य इहैतदद्य; कर्तुं समर्थो भुवि मर्त्यधर्मा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति