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विराट पर्व
अध्याय १८
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द्रौपद्यु उवाच
अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम् |  ३३   क
विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शय़न्तं च वाजिनः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति