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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्ते धर्मराजस्तमर्जुनं प्रत्यपूजय़त् |  ५   क
भीमसेनः कटाक्षेण वीक्षां चक्रे धनञ्जय़म् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति