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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
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व्राह्मण उवाच
अतो निय़म्यते लोकः प्रमुह्य धर्मवर्त्मसु |  २०   क
यस्तु योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति