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आदि पर्व
अध्याय १७९
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वैशम्पाय़न उवाच
सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण; शरांश्च जग्राह दशार्धसङ्ख्यान् |  १६   क
विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च; छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति