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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
तिस्रो वै गतय़ो राजन्परिदृष्टाः स्वकर्मभिः |  ९   क
मानुष्यं स्वर्गवासश्च तिर्यग्योनिश्च तत्त्रिधा ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति