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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
एवमेव महेष्वास प्रिय़वाक्यान्महीपते |  ६   क
अहिंसा दृश्यते गुर्वी ततश्च प्रिय़मिष्यते ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति