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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते |  ५   क
पृष्ठतश्च समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति