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वन पर्व
अध्याय १७७
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सर्प उवाच
क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्याय़ेन दमेन च |  ७   क
त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तो विक्रमणेन च ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति