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वन पर्व
अध्याय १७७
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सर्प उवाच
श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर |  ३३   क
भक्षय़ेय़महं कस्माद्भ्रातरं ते वृकोदरम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति