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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
नित्येन व्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् |  ८३   क
महय़न्ति च लोकाश्च महेश्वर इति स्मृतः ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति