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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
तेनानुशिष्टार्ष्टिषेणेन चैव; तीर्थानि रम्याणि तपोवनानि |  २२   क
महान्ति चान्यानि सरांसि पार्थाः; सम्पश्यमानाः प्रय़युर्नराग्र्याः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति