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शान्ति पर्व
अध्याय १७३
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भीष्म उवाच
परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणाम् |  २७   क
मूलं रुन्धीन्द्रिय़ग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति