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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
एवं देवा यजन्तो हि सिद्धाश्च परमर्षय़ः |  ८८   क
प्रार्थय़न्ति परं लोके स्थानमेव च शाश्वतम् ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति