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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
पक्षिणः पशवो गावो मुनय़श्चापि सुव्रताः |  १८   क
परमं प्रय़तात्मानो न शान्तिमुपलेभिरे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति