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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
विकीर्णमस्त्रं तद्दृष्ट्वा तथा भीमरथं प्रति |  ८   क
उदीर्यमाणं द्रौणिं च निष्प्रतिद्वन्द्वमाहवे ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति