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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
एतैश्चान्यैश्च वहुभिर्नानारूपधरैस्तथा |  ४७   क
सर्वमासीज्जगद्व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति