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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम् |  ३९   क
त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम् |  ३९   ख
लेलिहानैर्महानागैः कृतशीर्षममित्रहन् ||  ३९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति