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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
शल्ये तु निहते राजन्मद्रराजपदानुगाः |  १   क
रथाः सप्तशता वीरा निर्ययुर्महतो वलात् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति