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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रन्दो महानासीत्पाण्डवानां विशां पते |  ९९   क
दृष्ट्वा सेनापतिं यान्तं पाञ्चालानां रथव्रजान् ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति