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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुत्य राधेय़ः प्रहसन्वै पुनः पुनः |  ९१   क
सज्यमस्य धनुः कण्ठे सोऽवासृजत भारत ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति