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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तत्राकरोन्महाराज कदनं सूतनन्दनः |  १००   क
मध्यं गते दिनकरे चक्रवत्प्रचरन्प्रभुः ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति