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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
वृषणः शङ्करो नित्यो वर्चस्वी धूमकेतनः |  ८०   क
नीलस्तथाङ्गलुव्धश्च शोभनो निरवग्रहः ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति