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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः |  १३५   क
प्रीतात्मा प्रय़तात्मा च संय़तात्मा प्रधानधृक् ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति