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स्त्री पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
उपस्थितेऽस्मिन्सङ्ग्रामे ज्ञातीनां सङ्क्षय़े विभो |  ५   क
मामय़ं प्राह वार्ष्णेय़ प्राञ्जलिर्नृपसत्तमः |  ५   ख
अस्मिञ्ज्ञातिसमुद्धर्षे जय़मम्वा व्रवीतु मे ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति