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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
किं कृतं सलिले शर्व चिरकालं स्थितेन ते |  २३   क
किमर्थं चैतदुत्पाट्य भूमौ लिङ्गं प्रवेरितम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति