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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
अधर्ममेतद्विपुलं धार्मिकः सन्न वुध्यसे |  १६   क
यत्त्वमात्मानमस्मांश्च प्रशंस्यान्न प्रशंससि |  १६   ख
यः कलां षोडशीं त्वत्तो नार्हते तं प्रशंससि ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति