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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टलोमकूपाः स्म संविग्नरथकुञ्जराः |  २३   क
धनञ्जय़ गुरुं श्रुत्वा तत्र नादं सुभीषणम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति