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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
एते शव्दा भृशं तीव्राः प्रवृत्ताः कुरुसागरे |  २०   क
मुहुर्मुहुरुदीर्यन्तः कम्पय़न्ति हि मामकान् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति