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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वशः |  २१   क
प्रत्यविध्यमहं रोषाद्दशभिर्दशभिः शरैः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति