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शान्ति पर्व
अध्याय १६७
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भीष्म उवाच
एतत्प्राह पुरा सर्वं नारदो मम भारत |  १८   क
संस्मृत्य चापि सुमहदाख्यानं पुरुषर्षभ |  १८   ख
मय़ापि भवते सर्वं यथावदुपवर्णितम् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति