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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
मित्रव्रह्मगुरुद्वेषी जाल्मकः सुविगर्हितः |  ५६   क
पाञ्चालापसदश्चाद्य न मे जीवन्विमोक्ष्यते ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति